Monday, 17 November 2014

मैं अपने इज्जत का बदला जरुर लूंगी

अभी भी हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग है जो रिस्ते के नाम पर कलंक माने जा रहे है। ऐसे ही कुछ रिस्तों की कहानी इस बच्ची की जुबानी सुने।

मेरा नाम मोनिका उम्र-18 वर्ष है। मेरे पिता का नाम बुच्चुन है। मैं जाति की मुस्लिम हूँ। मेरे माता जी का नाम हदीसुन है। हम लोग चार भाई चार बहन है। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही है। मैं ग्राम-नथईपुरपोस्ट-कुआर बाजारथाना-फुलपुर,जिला-वाराणसी की निवासी हुँ।

मेरे पिता जी शादी मे बैण्ड पार्टी का काम करते है। यह घटना 9 अप्रैल, 2014 की जब मैं बी00 प्रथम वर्ष की परीक्षा देकर घर लौट रही थीतभी मेरे बड़े पिता जी का बेटा सद्दाम कालेज के पास देखने आया। परन्तु मुझे लड़कियों के समुह में देखकर चला गया। तब मैं इस बारे में कुछ समझ नही पायी पर जैसे ही मेरी सभी सहेलियां चली गयी और मैं पैदल अपने घर के तरफ जाने लगी तभी सद्दाम व उसका एक मित्र गोपी विश्वकर्मा के साथ काले रंग की बाइक से आया मेरा हाथ पकड़कर गाड़ी पर बैठाने लगा मैं घबरा गयी जब मैंने विरोध किया उसने सड़क पर में एक लात मारा और मेरा हाथ पकड़कर खीचा और मै तेज मैं चिल्लाती उतना तेज मुझे सब मारते और कहते थे कि आज चिड़िया जाल में फ़सी है। इसको छोडुगा नही। दोपहर का समय था रोड़ पर सन्नाटा छाया हुआ था। इसलिए वो सब मेरे साथ जितना मनमानी करते बना किये मेरा ड्रेस तक फाड़ दिये जब मैं कुछ बोलती तो सब मारने लगते थे। इतना ज्यादा सब मारे थे कि खुन निकलने लगा। मुँहनाक से हाथ दोनों लाल हो गया। मेरे दोनों पैर पर भी मार का निशान पड़ गया। मैं जो कालेज का यूनिफार्म पहनी थी। वह फट गया दुपट्टा अस्त व्यस्त हो गयाकपडे़ पर खुन के निशान लग गये फिर भी वह मुझे घसीट ही रहे थे तथा मना करने पर मारने जा रहे थे। जब मुझे वह बिठा के बाइक पर ले जाने में असफल रहे तो वह मुझे उसी हालत में छोड़कर भाग गये तथा थोड़ी देर बाद कुछ लोग आये और मुझे घर पहुँचाया।

उन लोगों ने मुझे इतना मारा था कि मैं तीन दिन तक पं0 दीनदयाल चिकित्सालय में भर्ती थी। इसके बाद कुछ ठीक हुई तो मैं तुरन्त फुलपुर थाने में गयी और पुुरी घटना के बारे में जानकारी दी । लेकिन पुलिस ने मेरी बातों को अनसुना कर दिया और दोषियों पर कोई मुकदमा दर्ज नही किया। बल्कि मेरे ही बयान को उल्टा करके कुछ महत्वपूर्ण तथो को हटा दिया। पुलिस के इस रवैये से दोषियों का हौसला बुलन्द हो गया और वह मुझे लगातार धमकी दे रहे है कि इस बार तो केवल हाथपैर ही टुटे है। अगली बार लाश जायेगी। गोपी विश्वकर्मा एवं उसकी माँ शीला विश्वकर्मा राजनीतिक पार्टी सपा से अपने संबधों का हवाला देकर डराते है तथा पुलिस वालों भी इन लोगों के दबाव में कोई कार्यवाही नही कर रही है।

हम चाहते है कि जिस तरह मेरे इज्जत के साथ खिलवाड़ किये है। उसी तरह उन सबको भी सजा मिले। जब तक मैं उनको सजा नही दिलवा लेती मैं चुप बैठने वाली नही हूँ।

बाहर जब मैं निकलती हूँ तो बहुत शर्म लगता हैलोग देखकर काना-फुसी करने लगते है। मन करता है बस एक कमरे में छुपकर बैठी रही हुँ। किसी से बात चीत करने का मन नही करता पढ़ने में भी मन नही लगता जैसे सर पर बोझ सा रखा हुआ है। पता नही आगे की पढ़ाई कैसे होगी माता-पिता भी हदस गये बाहर निकलने नही देगे। आपको अपनी घटना बता कर बहुत हल्का पन महसुस कर रही हुँ। क्योंकि कोई भी मेरी बातों को इस तरह सुना ही नही लोग देखकर नजर फेर लेते है।

संघर्षरत पीड़िता % मोनिका       साक्षात्कारकर्ता % छाया कुमारी

Wednesday, 12 November 2014

’’एक बार ससुराल वालो का अत्याचार सहकर छोड़ चुकी हूँ दूबारा नहीं’’


महिलायें सदियों से हमारे समाज में प्रताड़ना की शिकार होती रही है। वह जब अपने एक और अधिकार के लिए लड़ती है तो समाज में उन्हे तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है, फिर भी वह इन तमाम मुश्किलो का सामना कर अपनी मंजिल तय ही कर लेती हैं।

मेरा नाम सुशीला देवी उम्र 32 वर्ष हैं। मेरे पति स्व0 राजकरन पटेल है। मै अशिक्षित हूँ। मै सरकारी प्राथमिक विद्यालय में खाना बनाने का काम करती हूँ। मै ग्राम-नयापुरा, थाना-घुरपुर, ब्लाक-चाका, तहसील-करछना, जिला-इलाहाबाद की रहने वाली हूँ।
मेरा दुबारा विवाह 14 फरवरी, 2005 को स्व0 राजकरन पटेल से हुआ था शादी के बाद से ही मेरे ससुराल वालों द्वारा मुझे सताये जाने लगा। मेरे पति को उन लोगों द्वारा मारा-पीटा जाता था और उन पर यह दबाव बनाया जाता था कि हमे छोड़ दे। मेरे पति की पहली पत्नी को भी ससुराल वालों के दबाव के कारण छोड़ना पड़ा था। मेरे पति का स्वभाव मेरे प्रति अच्छा था। वह हमेशा मेरा साथ देते थे। यह बाते उन लोगों को बर्दाश्त नही होती थी। जिसमें से कुछ जमीन हम लोगों को लिए दी गयी थी। वह जमीन रेलवे में चली गयी। जिसका मुआवजा सरकार द्वारा मिला जिसे मेरे ससुर ने ले लिया था। हमारे पास न अब कोई जमीन थी न ही कोई पैसा। मेरे पति जो बनी मजदूरी करते थे और मै जो कमाती थी उसी से मेरे परिवार का खर्च चलता था।
          
   एक दिन मेरे पति ने मेरे ससुर से कहा बाबूजी दो हजार रुपया हमे दे दिजिए वह कई दिनों तक गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उन्होंने एक रूपया भी नहीं दिया। 4 मई, 2013 शनिवार के दिन मै बाबूजी से बोली बाबूजी उन्हें पैसा दे दिजिए वह बहुत परेशान है, तब उन्होंने कहा अभी उसे और तुम्हें बहुत रोना और परेशान होना है। यह बात कहकर वह कही चले गये। रविवार को भी बाहर रहे। सोमवार के सुबह मेरे पति मुझसे चाय पीने के लिए कुछ पैसा माँग रहे थे। मैने अपने टोक में से दस रुपये का नोट छोड़ कर दिये। वह चाय के पीने चले गये। कुछ देर बीत गया समय बहुत ज्यादा होने लगा तब आस-पास वालो से पूछे भईया मेरे पति को देखो हो। तब सबने यही जबाव दिया नही आते होगे उनका इन्तजार करते-करते शाम हो गयी। इस समय मेरा दिल घबराने लगा। हम बिना खाये-पीये इन्तजार करती रही। पता नहीं उस दिन मन के अन्दर से बहुत बेचैनी हो रही थी। देखते-देखते शाम हो गयी। मै अपने घर पर ही थी तभी गाँव के ही एक लोग आये बोले तुम्हारा आदमी खत्म हो गया।

मुझे उस समय कुछ समझ में नहीं आ रहा था। यह बात सुनते ही मै पागलो की तरह बाहर दौड़कर उसके पास आयी, तो घर के बाहर उनकी लाश पड़ी थी, उनके आँखों से खून निकल रहा था। ऐसा देखकर लग रहा था कि अभी कुछ समय पहले उसके साथ कोई र्दुघटना हुई है। मैं भर निगाह देख ही नही पायी कि मेरे ससुर ने मुझे ढकेल दिया और ले जाकर कमरे मे बन्द कर दिया। मै उनसे रोती गिड़गिड़ाती रही मुझे मै कही उन्हे अपने आखों से जीभर कर देख लेने दिजिए लेकिन वह एक भी नहीं सुने उनके सभी रिश्तेदार और आस-पास के लोग देख रहे थे। किसी ने हमारी ममद नही की मुझे बाहर से सिकड़ी लगाकर वह लोग मेरे पति की लाश लेकर चले गये, पता नहीं उन लोगों ने उनका कफन दफन किया था या नहीं। मेरे ससुर ने अपने रिश्तेदार और दामाद को पहले से खबर दे दी थी। मैं अन्दर से रोती चिल्लाती रही किसी ने मेरी एक भी नही सुनी। इनकी मौत की खबर मेरे मायके वालो को भी नहीं दी। कुछ देर बीत जाने के बाद तब पास के ही लोगों ने दरवाजा खोला। मैं उस समय रोती गिड़गिडाती रही लेकिन मेरा आँसू पोछने वाला कोई नही था। मै अपने आपको अकेला महसूस कर रही थी। जब उन लोगो ने मुझे बन्द किया था तो उस समय ऐसा लग रहा था कि कैसे बाहर आ जाऊॅ कोई भी जल्दी से दरवाजा खोल दे मै तड़प रही थी। अभी भी उस बात का दुख है आखिरी बार उन्हें जीभर के देख नहीं पायी।
           
मेरे ऊपर इतनी बड़ी आफत आयी थी किसी ने मुझे सहारा नही दिया। दुसरे दिन पास-पड़ोस के मदद से मायके खबर भेजी व लोग आये तब मुझे ले गये।
            मेरे पति जब घर से निकले थे सही सलामत थे उनकी साजिश कर हत्या करायी गयी। पुलिस ने भी इस मामले की जाँच नहीं की उनकी एक्सीडेन्ट से मौत हुई थी। इस बात का भी जाँच नहीं हुई। मैने घुरपुर थाने में एक प्रार्थना पत्र दिया कि मेरे पति की मृत्यु कैसे हुई इस मामले की जाँच हो। तब वहा भी पैसा देकर मेरे ससुर ने मामले को रफा-दफा कर दिया। मुझे यह समझ में नही आ रहा था कि मेरे ससुर अपने बेट की मौत पर अपना मुँह क्यो बन्द किये है।
            
कुछ दिन मायके रहकर दौड़ धूप किया कोई हल नहीं मिला फिर वापस अपने ससुराल काम करने चली गयी। कुछ दिन तक ठीक रहा फिर मेरे ससुर ने परेशान करना शुरू कर दिया। वह मुझे डराने धमकाने लगे कि यहा से भाग जाओ नही तो तुम भी मर जाओंगी यह सब सुनकर मेरा मन बहुत घबराने लगा पहले तो पति का सहारा था, जब वह हमे मारते और हमारे ऊपर अत्याचार करते थे। हमें घर से भगा देते थे। तब हम लोग चुपचाप घर छोडकर अपने मायके चले आते कुछ दिन गुजार कर फिर वापस चले जाते आये दिन मेरे जेठ और उनका लड़का मेरे पति को मारता रहता था। तब हम दोनो एक दुसरे कर सहारा बनते थे। अब तो मै बिल्कुल अकेली पड़ गयी हूँ। कहा जाऊॅ मायके वाले भी गरीब है पिता के गुजरने के बाद माँ बीड़ी बनाकर गुजारा करती है। एक भाई है जो मजदूरी करता है अभी दो बहनो के शादी की जिम्मेदारी भाई पर ही है। अगर उनके पास जाती हूँ। तो मै भी उनके ऊपर बोझ बन जाऊगी। यही सोचकर मैं अपने ससुराल मे ही उनके अत्याचार सहते हुए रहने लगी। दिन पर दिन वह हमे धमकाने लगे कि छोड़कर चली जाओ नही तो मुझे भी मारी जाओगी जब यह सुनती थी तो बहुत तकलीफ होता था रोती थी मन में डर भी था कि हमे अकेला पाकर वह लोग मार न डाले लेकिन मन में यही ठान लिया कि अब मै दुखियारी को अपनी लड़ाई लड़कर यही अपना जीवन गुजर बसर करना है। भगवान ने मेरी बड़ी परीक्षा ली है। एक बार ससुराल वालो के अत्याचार से छोड़कर चली आयी लेकिन अब दुसरी बार उनके अत्याचार को नही जाऊगी। मैने एक मानवाधिकार संस्था की दीदी की मदद से प्रोबेशन कार्यालय में प्रार्थना पत्र दिया। वहा हमारी और ससुर की पेशी हुई। वहा भी अधिकारी के सामने ससुर ने हमारे अपना हक हिस्सा देने से इन्कार कर रहे थे। वह वहा भी हमे झूठा ठहरा रहे थे। अधिकारी सर से उन्होंने मोहलत ली की हम कुछ दिन बाद बताये गे। 11 दिसम्बर, 2013 को तारीख मिली। अधिकारी कार्यालय से घर जाने के बाद वह मुझ पर तमाम आरोप लगाने लगे। गन्दी-गन्दी गालिया देने लगे और कहने लगे की हम हिस्सा नहीं देगे। चाहे जो कर लो उनकी बात मै चुपचाप सहती रही अन्दर से डरती रही कि फिर कुछ मेरे साथ अनहोनी न करे।
           
जब अगली तारीख पर हम प्रोबेशन कार्यालय गये तब मेरे ससुल वहा दो वकील लेकर गये थे। वह मुझ पर तमाम आरोप लगा रहे थे। लेकिन वहाँ पर हमारे हक में फैसला किया गया। ससुर ने जून, 2014 में खेत को तीन हिस्से में बराबर बटवारा किया। कुछ पैसा बैंक में फिक्स है पूरा होने पर उसमें भी हक देने की बात कही है। मुझ दुखियारी को इससे बहुत राहत मिली है। समय का इन्तजार है खेती बारी मिलने पर मै उसमें उपज कर अपना जीवन गुजार सकेगी। मेरे पास कोई बच्चें नहीं है कम से कम इसके सहारे मै अपनी जिन्दगी बिता सकती हूँ।
          
  अभी भी डर लगता है। रात को नींद नहीं आती है पति की हमेशा याद आती है एकदम अकेला महसूर करती हूँ। मन हमेशा अशान्त रहता है। मन में थोड़ी सी आशा जगी है।
            मैं चाहती हूँ जो मेरे ससुर ने कबुला है वह एक हिस्सा मुझे मिले। जिससे मेरे साथ न्याय हो।

सघर्षरत पीड़िता     _        सुशीला
साक्षात्कारकर्ता     _      फरहद शबा खानम्
                                   
                                     

Sunday, 9 November 2014

Satyamev Jayate - Season 3 | Episode 6 | When Masculinity Harms Men





When Masculinity Harms Men
95% of incidents of violence in India are committed by men. The final episode of Season 3 examines why this is the case and how deeply-entrenched notions of masculinity affect attitudes towards women. The episode also helps explain the larger violence we witness in society, be it in incidents of road rage, ragging or acid attacks. It explores how fixed notions of masculinity are shaped and how they victimize not only those at the receiving end, but men themselves as well.

On youtube:

Guest profile:
Dr Lenin Raghuvanshi grew up in Uttar Pradesh where he saw unequal relationships between men and women, with the men being stronger, violent and controlling of the women. He chose a different path for himself and went on to become one of the founding members of People's Vigilance Committee on Human Rights, a Varanasi-based NGO which works for the upliftment of the marginalized sections of the society. He is also a Dalit rights activist.
Email: lenin@pvchr.asia | Website: www.pvchr.asia

How masculinity ends up crippling men, depriving them of expressing normal human emotions like love, pain and vulnerability is the focus of this segment. Five men originally from the U.P.-Haryana regions talk about how they were taught by their own families to suppress their instincts and conform to a certain stereotype of being male and how this manifested in their behaviour.

Tuesday, 28 October 2014

Satyamev Jayate - Season 3 | Episode 4 | We Recommend | Sickness looms





Gulam Sarvar belongs to a community of weavers in
Benaras who are renowned for weaving Benarasi saris through generations. But
nowadays, the community is receiving attention for another reason: TB.
“Initially I was not feeling hungry, then I started coughing and having fever,”
says Sarvar. “Then I became really weak and was bed-ridden and could not work
anymore.” Gulam was infected with TB.

This is not just the story of Gulam Sarvar. There
are thousands of such weavers who are becoming a victim of this disease. Around
30% of the population is infected with TB. It is easy for the weavers to get
infected because of the dingy spaces they work out of. There is not much light
or fresh air in the rooms where the looms are and the conditions are perfect
for the TB bacteria to come into full form. The dust, the smoke and the fibre
also add to the hazardous mix which brings down their immunity – priming them
for an attack.

Malnutrition is another reason why the weavers'
immunity is low. What worsens the state of the patients is the lack of proper
medical attention and facility. On one hand the government officials are
negligent and the other is the problem of patients going to quacks instead of
trained health professionals. This is aggravated by the poverty of the weavers.
“We take the medication for as long as we can afford it,” says Badarunisha. But
can we afford to leave these weavers to their fate?


Few link of PVCHR initiative on TB:



Saturday, 19 April 2014

The need of the hour is to create new dynamics and debate within India: Lenin Raghuvanshi

We had a strong Dalit movement before formation of RSS in 1925. We have saints like Kabeer, Raidas who were an epitome of our syncretic, plural and tolerant Indian culture. Hindutva has nothing to do with Hindu religion per se. The Hindutva ideology was a manifestation of British colonialism. The greatest ideologue of RSS Guru Golwalkar himself advised RSS cadres not to fight against the British occupation. They have an expansionist ideology. On one hand they are exploiting the dalits and on the other they are attacking other nationalities. They are even unhappy with me as I am fighting against casteism that forms a fundamental feature of their ideology. But the unfortunate part of the whole matter is that now major political parties are influenced by Hindutva ideology. http://thekashmirscenario.com/prominent-activist-co-founder-peoples-vigilance-committee-human-rights-pvchr-lenin-raghuvanshi-conversation-mushtaq-ul-haq-ahmad-sikander-early-life-influences-work-h/

Prominent Activist and Co-Founder Peoples Vigilance Committee on Human Rights (PVCHR), Lenin Raghuvanshi in a conversation with Mushtaq Ul Haq Ahmad Sikander, about his early life, influences, work, Hindutva and future plans
Tell us something about yourself?
I was born in plural family. Each member was different from another, yet they lived under one roof. My Grandfather was Gandhian, but there was contrast in him as he was a socialist and atheist too. My grandmother was religious. My father initially joined RSS, but Grandmother told him that the uniform black cap of RSS is anti-Hindu. Then my dad became a communist, but he is still religious. There was always an ideological tussle going on between my grandparents and parents. My Grandfather wanted me to be a Gandhian and my Father wanted me to become a communist. Hence this tussle gave me an exposure to varied shades of opinion since my childhood. Later on I self studied various philosophies, ideologies and religions, and five great people influenced my life and thoughts particularly and they include Prophet Jesus (pbuh), Prophet Muhammad (pbuh), Karl Marx, Buddha and Dr.B.R Ambedkar. I grew up in the Eastern part of Uttar Pradesh (U.P) that has nationalist links with mainstream India. Though in certain parts of U.P, RSS and Congress type mentality also prevails. But I envisage that we create different nations within India, as India has the potential for tolerating many sub Nations.
What is your educational background?
I studied Indian Medicine system at a Gurukul Kangri in Haridwar.
Keeping in view your professional education background, how were you inclined towards activism?
As I stated earlier that my father wanted me to become a full time Communist Party worker, but I wasn’t inclined to it whole heartedly. In 1989, I joined United Nations Youth Organization and started my activism with that. In 1993 I came to head its U.P chapter. In the same year we started Bachpan Bachao Aandulan (Movement for saving childhood). During that movement, I witnessed that there were no child laborers from upper caste people. Meanwhile I also got married in 1992, and my spouse also helped me in my activism and believed in my work.
So when and what reasons led to the establishment of Peoples Vigilance Committee on Human Rights (PVCHR)?
In 1996, I along with my wife Shruti founded the PVCHR. It is a community based organization, to break the closed, feudal hierarchies of conservative slums and villages by building up local institutions and supporting them with a high profile and active human rights network.  The caste based violence, exploitation of poorer sections of the society and the marginalization of Dalits and Adivasis led to the establishment of PVCHR.

What kind of activities does PVCHR engage with?
We work against the Caste system and the structural prejudice associated with it. We work for the reconciliation among communities. We are also working for making the environment conducive for Truth and Reconciliation. We are initiating a discussion about democracy and human rights in the cow belt. Presently we have more than fifty thousand members and in more than four hundred villages we are carrying out our activities.
So did your efforts help in bringing any Positive change?
Yes, there is a lot of change in more than two hundred villages. Since 2000 there has been no communal violence in Banaras, heart of the cow belt. Many religious leaders have united against Hindutva Fascism. The Mushar community has become confident and an indigenous leadership has evolved among them. 2/3rd Dalits, Muslims and OBCs are elected members in Governing Board of PVCHR from 2010.
Do you face any threats or intimidation regarding your work?
Yes the threats and intimidation tactics are very common, both by State and Non State actors.
Is PVCHRs particular focus presently on torture victims?
Yes, we are strongly focusing on the victims of torture. Since 2008 we are using Testimonial Therapy developed by PVCHR and Danish Organization Research and Rehabilitation center for Torture Victims (RCT) for the survivors of torture, in order to make them overcome the aftermath trauma associated with torture. Our testimonial Therapy model are using by partners of RCT in Srilanka, Cambodia and Philippines.
You have been talking and writing about what you call as the “Culture of Impunity” as prevalent in India. What does this Culture of Impunity mean?
Peace without Justice and suffering in silence is culture of impunity. Our constitution is modern but the rules are colonial. The Police Act 1861, can be a reference point. It was implemented by the British in India after the 1857 mutiny. It was anti India in its connotations and stature, but still there has been no change in it despite the fact that British left India in 1947.
So how to Fight and Resist against this culture of impunity?
The culture of impunity breaks humans. During the freedom struggle Muslims were fighting alongside with other communities, but where are they now? This culture of impunity has wrecked much harm and is responsible for numerous atrocities against minorities, dalits and adivasis. It helps the guilty, culprits and perpetuators of these atrocities go scot free. We still have draconian laws like Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) imposed on various parts of India, where the security forces have committed grave human rights abuses because of this blanket culture of impunity. We must educate, organize and agitate against this culture of impunity. We must be able to provide Psycho-Social support to the victims. Then there is a need to create debate about this culture of impunity. For Justice to be established we need to tell the truth and put up the facts before the people.
What is your opinion about the Hindutva fascism and their suppression of minorities?
We had a strong Dalit movement before formation of RSS in 1925. We have saints like Kabeer, Raidas who were an epitome of our syncretic, plural and tolerant Indian culture. Hindutva has nothing to do with Hindu religion per se. The Hindutva ideology was a manifestation of British colonialism. The greatest ideologue of RSS Guru Golwalkar himself advised RSS cadres not to fight against the British occupation. They have an expansionist ideology. On one hand they are exploiting the dalits and on the other they are attacking other nationalities. They are even unhappy with me as I am fighting against casteism that forms a fundamental feature of their ideology. But the unfortunate part of the whole matter is that now major political parties are influenced by Hindutva ideology.
You have also been writing that caste based structural biases and violence is embedded in our system. How do you explain the same?
During childhood days my grandma used to tell me, not to eat while facing south, neither sleep keeping your legs in the direction. Elderly in the village said not to visit southern quarter of the village. Since childhood I used to wonder what the secret of this word ‘Dakhkhin Tola’ (south ghetto) is.
As I grew up, started reading, started social activism, fought for the rights of bonded labours and traveled across the globe then I realized that in the south of every village there is South Africa (a Dalit quarter ) as ‘culture of silence’.
The silence imposed by draconian suppression sanctified by religious rituals of the Upper Caste was such that the outside world knew little about this colossal cruelty. Justice V.R.Krishna Iyer, former Judge, Supreme Court of India described the plight of the Dalits in the following words, “Courts to them are alien, laws their enemy and human justice their despair.”

The caste system continues to determine political, social, and economic lives of a billion people in South Asia. The caste system, straddling across the scrawny shoulders of the Untouchables, is like that Old man in Tolstoy’s story, who has all the sympathy for the poor bearer and would like to do anything but to get off his shoulder. The most significant aspect of caste is its ability to resurface without a trace of remorse on the part of the perpetrator. It is like that chemical addiction which once had makes you vulnerable to its guiles forever.
American modern conservative thinker Edmund Burke says correctly about India many years before, “In that Country the law of religion, the laws of the land, and the law of honour, are all united and consolidated in one, and bind a man eternally to the rule of what is called his caste.”
Traditional political system and  Hindu fascist forces are trying hard to maintain the old system of the power game. Money and muscle power, together with political string-pulling, often result in denial of justice for the hapless ‘have-nots’, especially the Dalits (untouchables), ravaged by poverty and illiteracy.
Atrocities and extortion on the Dalits, fake encounters, refusal to register complaints against the well-heeled, arbitrary arrests on false charges, illegal detention and custodial deaths are in commonplace.
In the absence of a modern social audit system, the keepers of the law often unleash a ‘police raj’, especially in rural India. A crippled National Human Rights Commission and its state subsidiaries with limited recommendatory control and a dysfunctional Legal Aid System depict a gloomy picture indeed.
Ironically, even after having shed the colonial yoke, its legacy continues in the administrative framework of our independent India marked with widespread corruption which has rendered many government-sponsored schemes in rural India a failure.
You have also written that Indian police has learnt the tactic of Community Punishment from caste system. How can these two be related?
You can witness this fact in India. If an upper caste person commits a crime, if ever he is punished, he will bear it solitarily. But if a lower caste person commits any crime the whole community will be punished for one man’s deeds. The Police have learnt community punishment from casteism. Also see how the Caste and Class structures are reinforced by the state machinery. Why are the regiments named on caste and class denominations like Rajputana, Dogra etc, whereas such amalgamations are contradictory to the constitution?
The Police atrocities against common people particularly the marginalized sections of society are growing with each passing day. What are the reasons responsible for that?
Police is the prime executive for the protection of Human Rights of common people. But in India the mindset of Police as inculcated by 1861 Police Act is synonymous to the British period when the Police saw all Indians as enemies. Even after Freedom Indian police witnesses citizens as its enemies. Hence the police reforms are must. We also need representation of minorities and marginalized sections of society in the police in order to change its outlook, bias and perception about them.
In most cases where the Police is found guilty of committing atrocities against the innocent civilians, we witness that they usually go scot free, while the innocent continue to suffer?
The prevalent culture of impunity is responsible for the guilty policemen going scot free. In Crpc and AFSPA the police and army have got the legal impunity that makes their persecution or punishment impossible.  We want to amend and remove these draconian laws. Armed Forces Special Power ordnance was imposed by the British colonial administration to crush the Quit India Movement that started in 1942, but even after Freedom Indian State implemented more draconian law as Armed Forces Special Power Act(AFSPA). Indian State is still not ready to pass the Anti Torture Bill. How can in such an environment you hope for policemen to be punished. These black laws create problems for National integration. We need to fight the mindset that is obstructing the amendment or revocation of these draconian laws, under the veil of National interests and sovereignty.
The growing corporatization is having severe ramifications on Nation Building and integrity. How can we resist this onslaught?
We need to strength the Neo Dalit movement. Neo-dalit campaign is against politics of division, exploitation and hatred with an alternative of unity of broken masses on base of reconciliation, democracy, secularism and non violence. First unity is unity against caste system, a historical system of exclusion i.e. unity among the lower castes people that have been suppressed since centuries with the progressive anti-caste people born in upper caste. This will be first of its kind unity, which will not be against any person born in to upper caste communities neither against any religion. Second unity is unity among minorities and communities who suffered with communal fascism, those who believe in communal harmony and people with secular values against neo-fascism. Unity of all poor from all communities against the suffering with neo-liberal policy is the third kind of unity. Fighting against neoliberal policy is not against democratic capitalism for people. Since those broken with different kinds of suppression and exclusion means dalit therefore these three kinds of unities is base of impart the neo-dalit movement. These three need to join hands and unitedly fight against the menace of corporatization based on exclusion, anti-people and anti-environment norms. We are opposing the corporatization whereas attacking cultural imperialism too, and trying to build pressure on Government through people demand for more budget on social structure such as education, health etc . If we will not fight against corporatization, they will make the country and people slave to their corporate goals.
Given your busy activist schedule, how do you balance that with your personal family life and its demands?
My wife Shruti is also an activist, while our son Kabeer is an independent child. We still live together in a joint family and I visit my parents when I find time.
So what are the future plans of PVCHR?
We are going to work in Kashmir, not for political negotiations or for solving Kashmir issue. We want to meet the victims and survivors of torture. We want to ask for pardons for the atrocities committed by the Indian State, and start reconciliation with people of Kashmir. We also want to offer psychological support to the victims of torture through Testimonial Therapy.
Any message for people?
The people must believe in themselves. The need of the hour is to create new dynamics and debate within India. The people musty make alliances with Dalits, Anti-Hindutva Movement and other marginalized people. The debate about Kashmir must be initiated within Indian particularly the cow belt, and it is obligatory on Kashmiris to change the mindset of the inhabitants of cow belt as far as Kashmir and other issues are concerned.
Lenin Raghuvanshi can be reached at pvchr.india@gmail.com
Mushtaq Ul Haq Ahmad Sikander is Writer-Activist based in Srinagar, Kashmir and can be reached at sikandarmushtaq@gmail.com

Friday, 11 April 2014

एक दिन ऐसा तुफान आया की माँ के आँचल से बेटा छुटकर चला गया

आज भी इस समाज में औरत की स्थिति बदहाली में हैं। लोग औरतो की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका उपयोग करते है। जहाँ औरत को एक वस्तु के नजरिये से देखते हैं। ऐसे ही समाज की हैवानी दृष्टी की शिकार महिला जिसके बेटे को इंसाफ की बात करने पर गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। आइये ऐसे ही एक माँ की पीड़ा की कहानी उसी की जुबानी सुनते हैं।

मेरा नाम पालो देवी, उम्र 37 वर्ष है। मेरे पति का नाम मिठाई लाल है। मैं जाति की मुसहर महिला हूँ। मेरे पास 2 बेटीयाँ और 4 बेटा है। मेरी बेटी का नाम लक्ष्मी, पूनम, और बेटो का नाम- गंगा, शिवशंकर, राजू, अनिल है। मैं ग्राम-लुत्तीपुर, पो0-केराकत, थाना-केराकत, जिला-जौनपुर, 0 प्र0. की निवासी हूँ। हम दोनों पति-पत्नी अलग-अलग जाति के हैं। मेरे पति जाति के यादव हैं। मेरे माता-पिता ग्राम-गुडा साई पो0-चुडुबिरा, जिला- सिमबम की रहने वाली है। मैं पेट के कारण भटकते- भटकते जिला- जौनपुर जिले में बैजू के भट्ठे पर आकर बस गयी। धीरे-धीरे समय गुजरता गया, मैं एक बच्ची से नवयुवती हो गयी। मुझे खुद ही पता नहीं चला। जिस भट्ठे पर हम काम कर रहे थे उसी भट्ठे पर मिठाई लाल भी काम कर रहे थे। दोनों लोग का एक दुसरे में मन बस गया और साथ में रहने के लिए शादी कर लिये। मेरे साथ शादी होने के कारण मेरे पति को समाज से कई तरह से प्रताड़ना झेलनी पड़ी। 
एक दिन ऐसा तुफान आया कि माँ के आँचल से बेटा छुटकर चला गया। आज से 7 साल पहले अनिल नाम का बेटा उस समय उसकी उम्र 14 साल की थी। जिस भट्ठे पर हम और मेरे पति काम करते थे। उस भट्ठा मालिक का नाम बैजू यादव था। जो केराकत जिला जौनपुर का रहने वाला है। भट्ठा मालिक के यहाँ काम करने के लिए अपने चचेरी मौसी जिसका नाम शान्ति है। उसको भट्ठा पर मेरे पति काम करने के लिए लगवा दिये। शान्ति काम करते-करते बैजू की रखैल बन गयी। मेरे पति एक बार बैजू को बोले कि किसी के माँ-बहन के इज्जत के साथ खिलवाड़ करते हो। ये बात सुनकर बैजू और शान्ति को बहुत बुरा लगा और उस समय दोनों मन बना लिये कि इसके बेटे को गोली से मार डालेंगे। तब हमारे रिश्ते पर अंगुली नहीं उठेगी। यही विवाद काफी समय से चलता रहा, एक दिन दुश्मनी का बदला लेने में उसने, मेरे बेटे अनिल को मौत के घाट उतार दिया। एक दिन शाम के समय दिन शनिवार को मेरा बेटा अनिल दुकान से लाई-चना लेकर माँ का आँचल थामने आ रहा था कि भट्ठा के मोड़ पर कोयला गिरा हुआ था, और बगल में ट्रक खड़ा था। उस ट्रक का आड़ पाकर बैजू यादव मेरे बेटे अनिल पर गोली चला दिया। मेरा बेटा वही पर गिरकर मर गया। बैजू यादव को जान ही लेना था, तो मेरा लेना चाहिए था। मासूम बेटे ने क्या बिगाड़ा था। मेरे बेटे को मारने के लिए तीन हथियार लेकर आये थे। गुड्डू राइफल लिया था, और गुलाब कट्टा, व बैजू गोली लिया था। जब गोली की आवाज आयी तब मेरे पति दौड़कर गये तो बैजू यादव सवदीपुर लाइन के किनारे भट्ठे पर भागकर चला गया। अपने पति के पीछे-पीछे दौड़ते हुये हम गये। जब हम अपने बेटे को खुन से लथपत देखे तो हम वहीं पर गिरकर बेहोश हो गये। तुरन्त बैजू आकर मेरे पति से पूछने लगा कि कौन गुण्डा मारा है। चलो गुण्डा को खोजे। मेरे पति बोले तुम्ही ने तो मेरे बेटे को मारा है, तुम पापी हा,े तुम्हे इस धरती पर तो क्या नर्क में भी जगह नहीं मिलेगा। पापी मेरे बेटे को आखिरी दम तक छुने नहीं दिया। हमको और मेरे पति को दूर ही बैठा दिया। हम लोग डर के मारे बैठे रह गये, पापी ने मेरे बेटे को कफन तक देने नहीं दिया। उस समय इतना गुस्सा आ रहा था कि बैजू का गला घोट दें। उसी तरह मेरे बेटे को गमच्छा में लपेटकर पर सेवा घाट पर ले जाकर गड्डा खोदकर मेरे बेटे को गाड़ दिया। हम और मेरे पति पापी से कहते रह गये कि कम से कम आखिरी समय मेरे बेटे को दिखा दो, लेकिन हम लोगों का उसने एक भी नहीं सुना। भट्ठा मालिक हमारे पूरे परिवार को बहाने से बुलाकर एक कमरे में 25 दिनों तक बन्द करके रखा। उस समय ऐसा महसुस हो रहा था कि एक कुत्ता ठीक लेकिन हम लोग की जिन्दगी ठीक नहीं है। 25 दिन बाद अपने मार्सल में बैठाकर मेरे पूरे परिवार को बनारस स्टेशन लाया, और राँची के लिए हम लोगों को बस में बैठा दिया। जब तक राँची के लिए बस चल नहीं दी, तब तक खड़ा होकर वह देख रहा था कहीं हम सब बस से उतर न जाय। राची से हम अपने मायके चक्रधरपुर चले गये। माँ को देखते हीं लिपट कर हम रोने लगे। माँ बिल्कुल घबरा गयी, बेटे की इतनी याद आती थी कि हम दिन रात रोते रहते थे। माँ के पास हम लोग एक महिना थे, कहीं पर कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। एक महिना माँ के पास रहकर फिर हम जौनपुर लौटकर आये। बेटे की इतनी याद आती थी कि सोते-जागते ही सोचते रहते थे। जब हम चन्द्रमणि सिंह के भठ्ठे पर गये तो बैजू यादव हम सबको धमकी देने लगा। हम भी सोचकर राँची से जौनपुर आये थे,  कि जब मेरा बेटा चला गया, तो मेरा भी मृत्यु बैजू की गोली से लिखा होगा, तो क्या हर्ज है। जब से बेटा मरा है, जीने की इच्छा नहीं होती। मेरा पूरा परिवार रोता रहता है। दिन रात में बेटे का फोटो देखकर हम सभी रोते रहते हैं। 7 साल में ऐसा कोई नहीं मिला जो मेरा दुख सुन सके। आपको अपनी घटना बताकर मन में बहुत हल्कापन महसुस हो रहा है। लेकिन अन्दर से पापी का डर भाग नहीं रहा है। मेरा पूरा परिवार उस पापी से हदस चुका हैं। उस पापी को उसके किये हुये अत्याचारों की सजा मिलनी चाहिए। ये एक माँ की ममता की आवाज है।

संघर्षरत पीड़िता : पालो देवी
साक्षात्कारकर्ता : छाया कुमारी                                           

Thursday, 10 April 2014

पुलिस वालो ने कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया

अभी भी हमारा समाज और कानून इतना अन्धा हो चुका है कि गलत करने वाले खुलेआम घुमते है, और जो हमारे देष के लिये कुछ करना चाहते है उनको फर्जी केस में फॅसाकर सलाखों के पीछे फेक दिया जाता है। आइये पढ़ते है उनकी जुबान से उन्हीं की कहानी।

मेरा नाम आनन्द कुमार यादव पुत्र श्री राम लाल यादव ग्राम व पोस्ट-पिण्डरा, थाना-फुलपुर, जिला-वाराणसी का निवासी हॅू।

घटना 11 मई 2013 को जब मै सुबह नहाकर बाजार जाने के लिये तैयार हो रहा था, कि अचानक दिन में करीब 11:00 बजे चार पहिया सफेद रंग की प्राईवेट गाड़़ी में 6 पुलिस वाले हमारे घर पर आये। जिसमे दो पुलिस अपने वर्दी में बिना नेम प्लेट के थे और चार लोग सादे डेªस में थे और आते ही मेरी माता जी सुशीला देवी से पुछे कि आनन्द कहा है। माता जी बोली क्या बात है। तब उन लोगों कि बात सुनकर मै घबड़ाकर बाहर निकला। जब मै पुलिस को देखा तो घबड़ा गया। माता जी बोली कि यही आनन्द है। पुलिस वालां से माता जी बोली क्या बात है। इतने में पुलिस हमको पकड़ ली और भद्दी-भद्दी जाति सूचक गाली देने लगे। मेरी माता जी हमको पकड़ने के लिए आगे आयी तो पुलिस वाले मेरी माता जी को धक्का दिये और वो जमीन पर गिर पड़ी और उन्हे चोट आ गयी। मै अपनी माता जी को गिरता हुआ देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गया। मै उस समय सोचने लगा कि यह मेरे और मेरे परिवार के साथ क्या होे रहा है। फिर पुलिस वाले मुझे घसीटते हुए जबरजस्ती गाड़ी में बैठाकर सीधे फुलपुर थाने ले गये। एस00 आवास के पीछे वाउण्ड्री में, वहाॅ एक कमरे में बन्द कर दिये और तुरन्त कपड़ा उतरवाने के लिए कहे। मैं कपड़ा उतरवाने की बात सुनकर शर्म से पानी-पानी होे गया। सोचने लगा ये सब क्या हो रहा है। पुलिस वाले ने मेरा कपड़ा जबरजस्ती क्यों उतरवा दिये। उस समय मैं केवल अण्डर वियर में था। एस00 राजकुमार तथा फुलपुर एस00 पर्व कुमार सिंह ने दो सिपाहिओ से मेरा हाथ पकड़वाकर  सीमंेन्ट के पीलर में हाथ फैलवाकर बाध दिये। और पट्टा से एस00 सचिदानन्द राय चोलापुर मुझे पट्टे से कमर के निचले हिस्से पर मारना शुरु कर दिये। हर चार पट्टा मारने के बाद मेरे चोट पर नमक और पानी का घोल डालते थे। जिससे मेरा दर्द और भी बढ़ जाता था। मैं रोता चिल्लाता रहता था लेकिन वहा पर मेरा कोई सुनने वाला नहीं था। मैं उन लोगों से बार-बार दवा के लिए कहता तो हमे चाय पिलाकर फिर से मारना शुरु करते और भद्दी-भद्दी गाली मा बहन गाली देते। उन लोगो का बार-बार यही कहना था। कि मैं जो कह रहा हॅू, तुम उसको कबूल करो। कि इसांन खान की हत्या मैने ग्राम प्रधान सिज्जन यादव व अमित चैबे के कहने पर किया हॅू। फिर उसके बाद पर्व कुमार सिंह भी उसी पट्टे से मारना शुरु कर दिये। मै रोते चिल्लाते बेहोश हो गया। पुलिस वालो ने हमे होश में लाने के लिए

मेरे नाक में मग्गा से पानी डाल रहे थे। कुछ समय बाद जब होश आया तब एस00 राजकुमार फुलपुर ने भी उसी पट्टे से मारना शुरु कर दिये। और मैं रोता चिल्लाता रहा। एस00 राजकुमार ने बोला कि हम जो कह रहे हैं तुम उसी को बोलो नहीं तो हम पोस्टमार्डम में दिखा देगे कि तुमने नदी में कुदकर आत्महत्या कर लिये हो। मैं एस00 राजकुमार से यही बार-बार कह रहा था। कि सिज्जन यादव व अमित चैबे को मैं नहीं जानता। और नाही उनके साथ मेरा कोई सम्बन्ध है। और ना ही मैने इसांन खान की हत्या किया है। मैं बार-बार कह रहा था, कि मैं पढ़ने वाला एक आम इसांन हू। मै पुलिस CRPF और आर्मी की तैयारी कर रहा हॅू। मैने बोला कि कुछ दिन पहले मैने CRPF की परीक्षा दिया था और परीक्षा फल में मेरा निकल भी गया है। मै आम इसांन हू इस घटना से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। और ना ही मेरा कोई अपराधी रिकार्ड किसी पुलिस चैकी व थाने में नहीं है। दिनांक 12 मई व 13 मई 2013 की रात में लगभग 8-9 10 बजे दो तीन पुलिस वाले शराब पीकर शराब की नशे में आते थे। और जाति सूचक गाली देते हुए थप्पड़ से मेरे गाल पर तथा कोहनी से मेरे पेट में मारते थे। उनकी मार से मुझे काफी पीड़ा होती थी। और मै रोता चिल्लाता था। और मन ही मन सोचता था कि मुझे किस जुल्म की सजा मिल रही है।
S.O पर्व कुमार सिंह और जो सिपाही मुझे रात में मारते और बोलते थे कि अपनी पत्नि और बहन को मेरे पास भेंज दो। तब हम तुम्हें छोड़ देगें। इतना सुनते ही मेरे अन्दर का खून खौल जाता था  और मन कर रहा था कि मैं इन लोगो को जान से मार डालू। लेकिन मैं कर भी क्या सकता था मै तो खुद पुलिस वालो के गिरफ्त में था। इन लोगो से दवा मागते थे तो वो लोग मुझे दवा नहीं दिये। और हमें 3 दिन तक थाने में ही बन्द करके रखे रहे। और मेरे साथ पशु से भी खराब सलुक किया जाता था। हमे न ठीक से खाना देते थे और न ही पानी देते थे, और  ठीक से थाने में सफाई नहीं करवाते थे।
13 मई, 2013 को पुलिस वाले मुझे पुलिस लाईन मनोरंजन कक्ष में विडिओ कान्फेंस के लिये लेकर आये। लेकिन वहा पर मेरा कोई बयान नहीं लिया गया। और पुलिस ने मीडिया को खुद अपना बयान दिया। मेरा विश्वास अब मीडिया वालो से भी उठ गया। जिसको इसांफ का आइना मानते थे।

14 मई 2013 को सुबह मेरा मेडिकल करवाने के लिये मुझे चार पहिया गाड़ी से लाया जा रहा था। रास्ते में S.O पर्व कुमार सिंह ने कहा कि चोट की बात डाक्टर के सामने मत कहना और ना ही चोट दिखाना नहीं तो तुम अभी मेरे हाथ में हो। फिर मैं पुलिस वालो के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पिण्डरा डा0 मौर्या से मेरा मेडिकल करवाये। और पुरी चोट को छिपा दिया गया। डाक्टर को जो समझ में आया वो लिखकर रिपोर्ट बना दिया। और फिर वहा से मुझे CGM कोर्ट कचहरी लाया गया। और मुझे मजिस्ट्रेट के सामने भी बोलने का मौंका नही दिया गया। और हमें 14 मई, 2013 को जिला जेल चैकाघाट के जेल में भेंज दिया गया। जब मैं जेल गया तो मुझे अन्दर से काफी दर्द महसुस हो रहा था। कि मै खुब रो रहा था। मन ही मन सोच रहा था। कि मेरा सब कैरियर सब खत्म हो गया। समाज में जो कमाया था सब एक ही झटके में खत्म हो गया। जेल में जब मै डाक्टर के पास गया और अपने कमर के नीचे का भाग दिखाया तो उन्होंने मुझे दर्द का दवा दिये। और सोने के लिए एक फटा पुराना कम्बल मिला। जेल के अन्दर मुझे जिस बैरक में बन्द किया गया था। वहा पर एक कैदी लैट्रीन बाथरुम की सफाई करता था। मच्छर बहुत काट रहे थें। वहा का खाना तो शायद पशु भी नहीं खाते। मै जेल के अन्दर 150 रु0 प्लेट का खाना अलग से खरीद कर खाता था। जेल के अन्दर मैं रोज रोता था। कि हमारे पास अब कुछ नहीं बचा सब खत्म हो गया। दो तीन दिन बाद जेल मे हमारी माता जी और मामा मुझसे मिलने के लिए आये। तब मैं उनको पकड़कर रोने लगा। जिस बैरक में हमें बन्द किया गया था। वही पर हमारा विडिओ कान्फंेस होता था। जिसमें वो हमारा नाम पुछते थे। तो मै अपना हाथ उठाता था। तो वे हमें तारिख बताते और हर 15 दिन में तारिख पड़ती थी। मेरी माता जी और मामा दोनो लोग मिलकर मेरा बेल करवाये। और मैं 27 जून, 2013 केा जिला कारागार चैकाघाट से जमानत पर छुटा और वही से अपने घर चला गया। घर जाने पर हमको काफी शर्मिन्दगी महसुस हो रही थी। कि मै क्या मुह लेकर सबके सामने जाउ। घर के सभी सदस्य हमारा बेशबरी से इन्तजार कर रहे थें और हम परिवार के सामने जाकर रोने लगे। कि हमारा भविष्य खत्म हो गया। मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर गया। मेरा सब कुछ लुट गया। मैं समाज में क्या मुह दिखाउगा।मैं घर के बाहर नहीं निकलता था कि पुलिस वाले मुझे फिर फर्जी केश में न फॅसा दे। पुलिस वालो को देखता हू तो अन्दर से काफी गुस्सा और पुरानी बाते मेरे सामने आ जाती थी। जिसके कारण रात में मुझे ठीक से नींद नहीं आती और मन बेचैन हो उठता है। कोई काम करने का मन भी नहीं करता। इस सदमे से मेरा मन हमेशा व्याकुल रहता हैं। जिसके कारण मै ठीक से पढ़ भी नहीं पाता। और मेरा CRPF पुलिस और आर्मी की तैयारी भी नहीं हो पाती। हमेशा डर बना रहता था। कि कही पुलिस वाले मुझे और मेरे परिवार को फिर से किसी फर्जी केश में न फॅसा दे।

हमें अपनी बात बताकर बहुत ही हल्का पन महसुस कर रहा हॅू। कि कोई मेरी बात सुन रहा है। हम चाहते है कि दोषी पुलिस वालो के खिलाफ कार्यवाही हो और हमें न्याय मिले।

 संघर्षरत पीडि़त : आनन्द कुमार यादव
 साक्षात्कारकर्ता :  महेश कुमार गुप्ता और रोहित