Monday, 30 April 2012

“सरकार की मनमानी से बेघर हुए पीडि़त का स्व व्यथा कथा”



मेरा नाम भिखारी साहनी, पुत्र-नथुनी साहनी है। मेरी उम्र-50 वर्ष है। मै जाति का मल्लाह (पिछड़ी) हूँ। मैं अम्बेडकर नगर (धोबईया), चैकाघाट, थाना-जैतपुरा, जनपद-वाराणसी का निवासी हूँ।

मेरे पाँच छोटे-छोटे बच्चे है। जिसमें सबसे छोटा बच्चा तीन साल का है। मैं ट्राली चलाकर किसी तरह अपने परिवार व बच्चों का भरण-पोषण कर पाता हूँ। जब मैं कभी-कभी बिमार पड़ जाता हूँ तो हमारे घर में भोजन के लिए चूल्हा भी जल नही पाता, जिससे हमारे बच्चों की स्थिति बहुत ही खराब हो जाती है। इसको लेकर मैं बहुत चिन्तित रहता हूँ। हमारे पास प्लास्टिक की चादर से घेराव करके बनायी हुई झोपड़ी थी, जिसमें बरसात के दिनों में पानी आ जाता था। जिसके कारण दो-दो दिन तक हमारे घर में चूल्हा नही जलता था। हम बच्‍चों व परिवार सहित भूखे रहते थे। बच्चों की ऐसी दुर्दशा देखकर हम व हमारी पत्नी सीमा हमेशा चिन्तित रहते थे। 


गर्मी में तपती धूप से बचने के लिए हम पूरा परिवार मिलकर अपनी झोपड़ी के चारों तरफ मिट्टी डालते थे। इसी बीच हमारी बस्ती में कैश फार इण्डिया नामक कम्पनी के लोग आये। उन्होंने लोन देने की बात कहीं। मैंने अपनी पत्नी सीमा से कैश फार इण्डिया के स्कीम पर चर्चा किया और आपस में निर्णय लिये कि लोन लेकर मकान बनाया जायेगा।

दूसरे दिन हमने कैश फार इण्डिया के लोगों से मिलकर चैबीस हजार (24,000) रूपया लिये। हम और हमारी पत्नी तथा बच्चे मिलकर बड़ी उत्साह से मकान निर्माण कार्य शुरू कर दिया। दो माह तक निर्माण कार्य चला। उस समय मैं रात में टाली चलाता था और दिन में मकान निर्माण कार्यो में बच्चों और पत्नी के साथ लगा रहता था। मेरा मकान बनकर तैयार हो गया और हम लोग अपने मकान में खुशी-खुशी रहने लगे। हमें उन दिनों बहुत ही खुशी व उत्साह रहता था कि हम लोगों का सपना पूरा हुआ। हम लोगों को अपना मकान हो गया है। अपने आप में हम गर्व महसूस करते थे कि मेरे पास मकान है।

लेकिन 29 जनवरी, 2010 की घटना हमारे जीवन का ऐसा मनहूस दिन था, जो किसी को न देखना पड़े, मेरी पत्नी की मृत्यु उसी कारण हुआ। उस सुबह लगभग 8:00 बजे बिना सूचना दिये दो जी0आर0पी0 (रेलवे पुलिस व गार्ड) बस्ती के चारों तरफ घुमने लगे और कुछ समय बाद लगभग पचास पुलिस वालों के साथ दो अधिकारी आये और साथ में बुल्डोजर वाहन भी आया। जब हम लोग बुल्डोजर वाहन को देंखे तो पूरी तरह से हैरान हो गये और पूरा शरीर पसीने से भींग गया तथा हाथ-पैर काँपने लगा। हम उसी समय सोच लिये की अब हम लोग बर्बाद हो गये। हम लोग अधिकारी व पुलिस के लोगों से रो-रोकर विनती किये की कुछ समय दे दीजिए, ताकि हम लोग अपना सामान बचा सके। लेकिन हम लोग की विनती का उन लोगों पर तरस भी नही आया और गाली देते हुए एक तरफ से मकानों को उजाड़ना शुरू कर दिया। उस समय पुलिस के लोग गन्दी-गन्दी गाली भी दे रहे थे और बोल रहे थे, ‘‘पाँच दिन में पूरी बस्ती खाली कर दो, नही तो हम जेल भेंज देंगे या गोली मार देंगे’’ और कभी-कभी बस्ती के मकानों को गिराते समय जोर-जोर से हँस रहे थे।

जिस समय बस्ती का मकान गिर रहा था, उस समय बस्ती में जोर-जोर से महिलायें, बच्चों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। देखते ही देखते पूरा बस्ती का मकान गिराकर समतल कर दिया गया। उस समय बच्चें कांप रहे थे और जोर-जोर से रोते हुये बोल रहे थे कि हम लोग कहा रहेंगे। कोई बच्चों को चुप करा रहा था, तो कोई महिलाओं को और कोई अपना समान बचा रहा था। हम लोगों का मकान के साथ-साथ समान भी टूट-फूट कर बर्बाद हो गया। बस्ती में कई दिनों तक किसी के यहाँ चूल्हा नही जला और हम सब खुले आसमान के नीचे रहने लगे।

12 फरवरी, 2010 को सुबह से लगातार बारिश शुरू हो गया। इसलिए पूरे बस्ती के लोग बारिश में भींगकर दिन और रात बिताये। इस बारिश में हमारे छोटे-छोटे बच्चे भींगकर ठंडी से काँप रहे थे। मेरी पत्नी सीमा से देखा नही गया। वह बच्चों को बारिश व ठंड से बचाव के लिए बस्ती में रो-रोकर प्लास्टिक (त्रिपाल) मांगने गई। मगर पूरे बस्ती में कही से भी प्लास्टिक नही मिला।

बच्चों को भींगता हुआ कष्ट देखकर मेरी पत्नी सीमा को सदमा लग गया। वह उसी दिन से खाना-पीना छोड़ दी। मेरा घर उजड़ने से सीमा की हालत बिगड़ती गयी। वह बार-बार कहती रहती थी, ‘‘मकान बनवाने में जो कर्ज लिये है, वह कैसे भरा जायेगा, हमारे बच्चे अब कहाँ रहेंगे’’ और पुलिस के लोगों की बात बार-बार कहती थी, ‘‘यह जमीन खाली करना होगा, नही तो जेल भेज देंगे।’’ मैं अपनी पत्नी सीमा को समझाता रहा लेकिन वह खाना-पीना छोड़कर हमेशा चिन्तित रहती थी। पुलिस के लोग हम लोगों को कभी भी या किसी प्रकार की इस तरह का सूचना नही दिये थे कि बस्ती खाली कर दो। अगर सूचना पहले दी होती तो हम लोग अपना सामान कही और रख देते। 

15 फरवरी, 2010 सूबह 3:00 बजे मेरी पत्नी सीमा की मृत्यु हो गयी। कुछ देर के लिए मेरी भी सांसे रूक गयी कि ये क्या हो गया। रेलवे विभाग ने मेरा घर उजाड़ दिया। जिसके सदमें से मेरी पत्नी सीमा की मृत्यु हो गयी। आज मेरा घर न उजड़ा होता तो मेरी पत्नी सीमा जिन्दा होती। इस घटना के बाद में हम ठीक से व्यवस्थित नही हो पा रहा हूँ। मैं रोज की तरह अब अपना काम नही कर पा रहा हूँ। कुछ समय के लिए बाहर निकलता हूँ तो बच्चों की चिन्ता बनी रहती है कि मेरे बच्चों को कुछ हो न जाय और दूसरी चिन्ता इस बात की है की कैश फार इण्डिया का कर्ज हम कैसे भर पायेंगे। अगर हम कर्ज न लिये होते तो मुझे कर्ज चुकाने की चिन्ता न होती।

16 फरवरी, 2010 को हम तहसील सदर, वाराणसी में आवास व आर्थिक सहायता हेतु तहसीलदार साहब के पास गये तो तहसीलदार साहब ने हमसे ठीक से बात नही किया और हमें बोले, ‘‘तुम बांग्लादेशी हो।’’ तहसीलदार साहब का व्यवहार व बात हमें उस समय बिल्कूल अच्छा नही लगा। हम सोचने लगे कि मेरे पास तो राशन कार्ड है और हम यहाँ पर जन्म से ही रह रहे है तो हम बांग्लादेशी कैसे हो गये। तहसीलदार साहब की बात मेरे दिमाग में बार-बार गुंज रही है। मैं अत्यन्त दुःखी और निराश होकर अपने घर आया और बच्चों को देखकर मेरे आंख से आंसू लगातार निकल रहे थे। मैं अपने आंसू को रोकने की कोशिश करता रहा, फिर भी मेरा आंसू नही रूक रहा था।

मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ या मेरी बस्ती के साथ जो कुछ हुआ है उसका इंसाफ हो तथा जाँच कराकर हम लोग के साथ न्यायोचित व्यवहार किया जाए। हम लोग भी मनुष्य है, और निष्ठुर कार्यवाही पूरी जिंदगी तबाह कर दी।

संघर्षरत पीडि़त - भिखारी साहनी
साक्षात्कारकर्ता - मंगला प्रसाद, आनन्द प्रकाश

Saturday, 28 April 2012

‘‘अगर मैं डायन थी तो मुझे निर्वस्त्र क्यों किया गया’’



मेरा नाम मनबसिया, उम्र-45 वर्ष है। मैं गाँव-घघरी, टोला-सहगोड़ा, ब्लाक-म्योपुर, थाना-बभनी, जिला-सोनभद्र की रहने वाली हूँ। मेरे पति का नाम जुद्धीलाल है, जो खेती का काम करते हैं। मेरे पास दो लड़के व सात लड़कियाँ हैं, जिसमें दो लड़कियों व एक लड़के की शादी हो गयी है। मेरे बच्चों का नाम-सूरतलाल, राजकुमारी, राजपत्ति, हीरामती, सोनामति, सोनकुमार, केवलपति, सीतापति व रामसूरत है। मैं भी पहले खेती-गृहस्थी करती थी, मगर अब शारीरिक कमजोरी के कारण नहीं कर पा रही हूँ।

मेरे जीवन का वो क्षण जिसमें मुझे डायन कह कर कुल्हाड़ी से मारा गया जिसका दर्द मेरे शरीर व मन से अभी तक नहीं गया है।

जुलाई 2010 में बुधवार का दिन था, शाम को 4 बजे रामरूप मेरे घर आये, जो गोतनी में मेरे भाई लगते हैं। आधा किमी दूरी पर उनका भतीजा दीपक रहता है, जिसका 1 साल का बेटा गुजर गया था उसी के सिलसिले में बुलाने आये थे। मैं सोची दुःख का समय है जल्दी चलो, मेरे पति बोले तुम चलो मैं आता हूँ। जैसे ही मैं उनके घर पहुँची वो लोग गंदी-गंदी गाली देने लगे, बोले तू डायन है तूने पता नहीं मेरे बेटे को क्या कर दिया? वो मर गया। तभी रामरूप घर के अंदर से आये और उस एक साल के बच्चे को मेरे ऊपर लाकर फेंक दिये, कहने लगे एक-एक करके मेरे खानदान को खत्म कर दे रही है। ये सब सुन मुझे बहुत तकलीफ हुई और गुस्सा भी आया कि ये क्या इल्जाम मुझ पर क्यों लगा रहे हैं। मैंने कहा चलो मेरा जाँच-पड़ताल करवा लोमैंने कुछ किया है तो कुछ नहीं बोले। तभी दीपक ने मुझे तेजी से पकड़ा और रामरूप गड़ासा लेकर मेरे ऊपर मारने के लिए दौड़े, बोले साली डायन है। हमें जल्द ही खत्म कर देना चाहिए, इतने पर रामरूप ने मेरे उपर गड़ासा चला दिया और मैं अचेत पड़ गयी, दीपक के छोटे भाई देवकुशन व पिता छोटे लाल मुझे गोजी (लाठी) से मार रहे थे। उस वक्त मुझे कुछ होश नहीं रहा। उनकी मार से मेरे होठ कट गये, चेहरे, छाती से खुन निकल रहे थे लैंगिक अंगों पर काफी घाव आ गया था। मेरी साड़ी ऊपर उछाल दिये थे तथा मुझे निःवस्त्र कर दिये थे, मेरे साथ क्या-2 हुआ था मुझे याद नहीं मगर जब मेरे पति पहुँचे तो हर दृश्य को उन्होंने देखा सारे लोग उनके आने के बाद न जाने कहा छिप गये, पता नहीं चला तब मेरे पति रोते हुए मुझे घर ले आये और म्योरपुर अस्पताल करीब 10 बजे पहुँचे। मैं 2 दिन तक बेहोश थी। जब 2 दिन बाद मेरे पति व बच्चे मेरे सामने आये तो उन्हें देखा मुझे रूलाई आ रही थी कि मेरे साथ क्या गंदा काम हो गया। जब मैं रोने लगी तो मेरे पति समझाये, जब सालों ने इतना गंदा काम कर दिया मगर मैं कुछ नहीं कर पाया। तुम वो सब बाते भूल जाओ हम तुम्हारे साथ हैं, चिंता मत करो।

10 दिन बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली 1 महीने तक घर पर ही प्राईवेट दवा बंगाली डा0 के यहाँ से हुई, मेरे पति एफ.आई.आर. दूसरे दिन थाने पर करायेे, पुलिस उन लोगों को जेल ले गयी। लेकिन वो लोग पैसा देकर जमानत करवा लिये। केस चल रहा है। दवा करवाने में 20,000 रू0 खर्च हो गया, 8 दिन तक मुझसे कुछ खाया नहीं गया, मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गयी है। इस समय शारीरिक कमजोरी की वजह से कोई काम नहीं कर पा रही हूँ सर में बहुत दर्द होता है। चक्कर सा आने लगता है, कुछ अच्छा नहीं लगता, आँख की रोशनी भी कम हो गयी है पानी भी गिरता है मुझे बार-बार यह सोचकर शर्मिंदगी आती है कि वो लोग मेरा कपड़ा उतारकर क्यूँ मारे, अगर मैं डायन थी, भूत-प्रेत करने वाली थी, मुझे बिना कपड़े सा क्यू कर दिये, केवल मार भी तो सकते थे। अस्पताल में महिला डा0 ने भी पूछा तुम्हारे साथ कोई दुष्कर्म तो नहीं हुआ, मैं उन्हें क्या बताती? मुझे तो कुछ याद नहीं था, मगर शरीर बहुत दर्द करता, पता नहीं वो लोग मेरे साथ क्या-क्या किये? ये सोचकर मुझे रात में नींद नहीं आती और यह भी लगता है कि अगर मैं मर जाती तो मेरे परिवार का क्या होता? मेरे बच्चे कैसे रहते? कभी - कभी बहुत गुस्सा आता है। बाहर जाने में डर लगता है कि कहीं फिर से लोग आकर न मुझे मारे। कोर्ट-कचहरी करने में 2000 रूपये लग गये।

अब तो मैं चाहकर भी कोई काम नहीं कर पाती अंदर से मन करता है लेकिन कुछ भी नहीं हो पाता। वो लोग कहते हैं उसे मुआ दिये थे मगर अभी तक वहे डायन नहीं मरी, अबकी बार ऐसा मारूँगा कि खत्म हो जाय। अभी भी दवा प्राईवेट अस्पताल में चल रही है।

आगे मैं यहीं चाहती हूँ कि उन दोषियों को सजा मिले जिसने मेरे साथ ऐसा किया। मुझे न्याय मिले।

संघर्षरत पीडित – मनबसिया
साक्षात्‍कारकर्ता – बरखा सिंह

Friday, 27 April 2012

‘‘डायन कहकर मेरी पत्नी के साथ किया अत्याचार’’


मेरा नाम जोधीलाल, उम्र-46 वर्ष है। मैं गाँव-घघरी टोला सह गोड़ा, ब्लाक-म्योरपुर, जिला-सोनभद्र का रहने वाला हूँ। मेरी पत्नी का नाम-मनबसिया, उम्र-45 वर्ष है। मैं खेती का काम करता हूँ। मेरे पास दो लड़के और सात लड़कियाँ हैं। एक लड़का व दो लड़कियों की शादी हो चुकी है। मेरी पत्नी भी खेती और रोपाई का कार्य करती थी, शारीरिक व मानसिक कमजोरी के कारण अब नहीं कर पा रही है। मैं अपने जीवन में दर्दनाक कष्ट सहा हूँ, मेरी पत्नी को गाँव के ही गोतिया (दयात) हैं वे अपने घर बुलाकर, घर में बन्द करके मेरी पत्नी को डायन बताकर उस पर कुल्हाड़ी से वार किया।

जुलाई 2010 में बुधवार का दिन था, शाम चार बजे मेरे घर रामरूप गोतिया- भाई लगते हैं और  मेरे घर से कुछ दूरी पर रहते हैं, उनका बेटा गुजर गया था, अन्तिम संस्कार करने के लिये हमें बुलाने के लिये मेरे घर आये। तब मेरी पत्नी तुरन्त चल दी, मुझे कही कि आप दरवाजा में ताला बन्द करके आइयेगा। मैं बोला ठीक है, तुम चलो हम आ रहे हैं। मेरी पत्नी वहाँ गयी, तब वहाँ लोग  बच्चे को मेरी पत्‍नी के गोद में दे दिये और बोले कि इसे जिलाओ। यह देखकर  उसके शरीर में डर पैदा हो गया। डर के मारे मेरी पत्नी कुछ नहीं बोल पा रही थी। उसके बाद वह बोले कि तुम डायन हो मेरे बच्चे को तुम्ही भूत कर दी, इसी कारण वह मर गया। मैं कहाँ-कहाँ दवा कराया, उसको दवा काम नहीं किया तुम (चुड़ैल) और डायन हो, तुम बच्चे को खा गयी, चलो जिलाओं, नहीं तो तुम्हे नंगा करके सिर का बाल काटकर काला करखा और सफेद चुना लगाकर पुरे गाँव में घुमायेंगे। यह कहते हुए रामरूप ने मेरी पत्‍नी को घिसराते हुए घर के अन्दर ले जाने लगा। वह जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगी।

वहाँ पर 40 लोग थे पर किसी ने कुछ नहीं बोला। अन्दर ले जाकर दिलीप ने कुल्हाड़ी सिर पर चला दिया, तब तक उसे होश था। उसने फिर सिर के दूसरी तरफ मार दिया, जिससे वह गिर पड़ी तथा होठ और दाँत पर भी मार दिया जिससे उसका दाँत टूट गया। उसके बाद कुल्हाड़ी से गाल पर मारा और वह बेहोश हो पड़ी तथा लहु-लुहान हो गयी। जब हम आये तो देखे कि यह क्या हो गया। यह देखकर मैं घबरा गया। मुझे भी गस्ती आने लगी। उस समय गाँव वालों ने कुछ नहीं बोला तब मेरी बहू रजमती और हमारी बेटी सुमन देवी अपनी माँ को देखकर रोने और चिल्लाने लगी। गाँव के कुछ लोग ने सहायता कर उसे उठाकर मेरे दरवाजे पर लाये। गाँव वालों ने सोचा कि मनवसिया मर गयी, लेकिन कुछ लोगों ने कहा वह अभी जिन्दा है उसे जल्दी हास्पिटल पहुँचाओ। उस समय मेरे पास पैसा नहीं था मैं पागल हो गया कि मैं क्या करूँ। तब हमारे गाँव के जयमंगल ने बभनी से गाड़ी मंगवाया। मैं अपनी जमीन और 13 पेड़ महुवा रेहन रख दिया जिससे 1000 रूपया मुझे तुरन्त मिला, तब हम उसे म्योरपुर सरकारी हास्पिटल ले गये। वहा के डाक्टर कहे कि इसमें कोई जान नहीं है,  इसे तुम बनारस बी.एच.यू. हास्पिटल ले जाओ। तब मैं बोला कि साहब मेरे पास पैसा नहीं है,  इसे भर्ती ले लिजिये। डाक्टर बोले कि पैसे का प्रबन्ध करो। मैं अपने बेटे को तुरंत फोन करके कहा कि कल सुबह पैसा लेकर आ जाना। तब डाक्टर ने नर्स से कहा इसे भर्ती कर पानी चढ़ावों।

दुसरे दिन मेरा लड़का आया तब टाका लगाया गया। उसके एक घण्टे बाद मेरी पत्नी को होश आया। फिर उसने जैसे-तैसे अपने पर हुए अत्याचार के बारे में बतायी। वह दस  (10) दिन वहीं हास्पिटल में रही। हम लोग पुलिस के पास गये लेकिन उन्होंने मेरे विपक्षी लोगों के उपर कोई ए.आई.आर दर्ज नहीं किया। बाद में फिर जब हम मेडिकल रिपोर्ट लेकर बभनी थाने पर में गया तब पुलिस वालों ने मुझे भद्दी-भद्दी गालियाँ देकर भगा दिया। उस समय मुझे और डर लगने लगा कि मेरी बेटी और बहु को भी न मार दे। हम रो-रो कर बहुत सोचते रहे मुझे रात में नींद नहीं आ रही थी, बस यही लग रहा था कि कहीं वे लोग फिर से आ न जाय।

उसके दो दिन बाद गाँव के लोग बोले कि तुम वकील के पास जाओ। हम अपनी पत्नी की दवा लेने दुद्धी गया तब विचार किया कि कचहरी चले जाये। वहाँ मुझे कुछ मदद मिल जायेगा। तब वहाँ वकील से मिलकर उन लोगों पर कोर्ट से वारन्ट जारी कराये। तब पुलिस आया मेरी पत्नी को बभनी थाने ले गया उसके बाद एफ.आई.आर. हुआ। विपक्ष दिलीप पुत्र होतीलाल, देव किसुन पुत्र होती लाल, होती लाल पुत्र धिरशाह पर मिश्रा दरोगा ने एफ.आई.आर. किया। इन लोगों ने पहले भी मुझसे जमीन और पेड़ को लेकर विवाद किया था मेरी पत्नी के साथ इतनी घिनौनी हरकत इन्होंने किया, जिसकी सजा इन्हें मिले और मुझ न्याय मिले।

आपको अपनी सारी बात बताकर मेरा मन बहुत हल्का हुआ है और आपके द्वारा कराये गये ध्यानयोग से मेरा शरीर और मन दोनों को शांति महसुस हुयी हैं।


संघषर्रत पीडि़त - जोधीलाल            

साक्षात्कारकर्ता - सत्य प्रकाश, पिन्टू

Saturday, 7 April 2012

यही सोचती कि क्या मैं सचमुच डायन हूँ ?


मेरा नाम जागेसरी देवी, उम्र 32 वर्ष है। मेरे पति रमाशंकर हैं। मेरे चार लड़के तेजबली, उम्र-11 वर्ष, रामबली, उम्र-6 वर्ष, श्याम नारायण, उम्र-4 वर्ष और राजनारायण उम्र-1 वर्ष का है। मैं ग्राम-करहिया, पोस्ट-म्योरपुर, थाना-दुद्धी, ब्लाक-म्योरपुर तहसील-दुद्धी, जिला-सोनभद्र की रहने वाली हूँ। मेरी शादी जुबैदा के (आसनडीह) में हुई थी। चार वर्षों तक मैं ससुराल में रही। बाद में मायके करहिया में अपने बाबूजी की देखभाल करने आ गयी। मेरी बड़ी तीन बहने अपने ससुराल में ही रहती हैं। खेती के लिए आठ विघा जमीन है जिस पर मैं और मेरे पति खेती गृहस्थी करके अपना जीवन बीता रहे हैं।

मेरी चचेरी बहन दुल्लर और बहनोई सहदेव जो मेरे घर से तीन घर की दूरी पर रहते हैं। इनको पाँच लड़के और दो लड़कियाँ थी। कुछ वर्ष पहले बिमारी के कारण इनके दो लड़के मर गये थे, अभी सानिया और एक छोटा बच्चा जो काफी समय से बीमार चल रहा था। मंगलवार की रात (31.07.2010) को सानिया मर गयी। यह खबर सुनते ही मैं भागी दौड़ी उनके घर गयी। वहाँ पर पहले से ही चार औरते और ओझा खेलावन झाड़-फुक कर रहे थे। मैं अन्दर बैठी थी। मेरे बहनोई अपने घर के दरवाजे पर लाठी, डंडा और टंगारी लेकर पैर फैलाकर बैठ गये।

बार-बार यही बात मुझे देखकर कहते डायनमेरे लड़के को खा गयी है। मैं तुम्हे नहीं छोड़ुगा। देखे बाहर कैसे निकलती है। यह बात सुनकर मुझे डर लगता था, सेाचती यह क्या कह रहे हैं किसी तरह रात गुजरी सुबह हुयी।

मौका मिलते सहदेव जैसे ही दरवाजे से हटा मैं अपने घर जल्दी से चली आयी, अगर वह आ गया तो फिर मुझे नहीं जाने देगा। घर आकर झाड़ू बर्तन करने लगी। कुछ दिन बीता शायद उस समय 12.00 बज रहा था। आस-पास के लोग लाश दफनाने के लिए आने लगे। मैं अभी घर का काम कर ही रही थी। तभी सहदेव ने मुझे बुलाया यहाँ आओमैं रात की बात से डरी थी लेकिन मरनी होने के कारण वहाँ गयी। गाँव के सभी लोग बैठे थे। करीब साठ लोग थे। ओझा अपना झाड़ फुक कर रहा था। मैं भी गाँव के लोगों के बीच में जाकर बैठ गयी। तो सहदेव ने मुझे आगे आने को कहा मैं जा रही थी सोच रही थी कि सभी बैठे हैं वह सिर्फ मुझे ही क्यों बुला रहा है।

जब मैं उसके करीब पहुँची मैं डर रही थी डरते हुए मैंने जीजा से पुछा क्या बात है तो वह मेरे हाथ में मरी हुई सानिया को देकर कहा डायनइसे जीला नहीं तो मैं तुम्हे नहीं छोड़ूगा। ओझा खेलावन मेरे चारो बगल घूमता और झाड़फूक करता।
 
बच्चे को गोद में लेकर मैं डरी सहमी हुई बैठी थी। काफी झाड़ फूक करने के बाद सहदेव ने मुझे अपनी जुबान निकालने के लिए कहा यह सुनते ही मैं घबरा गयी। यह अब क्या करेगा मेरे साथ सारे गाँव के लोग चुपचाप बैठकर तमाशा देख रहे थे। तभी सहदेव ने मुझे कहा अपनी जुबान निकालो इस पर चिया चरायेंगे (जुबान के ऊपर चावलका दाना रखकर मुर्गी से चराना) मेरा दिल अन्दर से धक-धक कर रहा था जैसे ही जुबान बाहर निकाली सहदेव ने चालाकी से अपनी हाथ में ब्लेड लिया था। मैंने उसे नही देखा था। मेरे जीभ पर वार किया जीभ कट गयी।

मैं दर्द से तड़पने लगी। रोती बिलखती रही सोचा ये क्या हुआ आस पास बैठे किसी ने मुझे सहारा नहीं दिया न ही सहदेव को ऐसा करने से मना किया। मुँह से खुँन निकलने लगा देखते ही देखते जमीन पर ढेर सारा खुन फैल गया। मेरे पति भी डर के वजह से नहीं बोले, सारा कपड़ा खुन से लथपथ हो गया था।

बस यही बात दिमाग में आती यह क्या हुआ यही सोचती क्या मैं सचमुच डायन हूँ। मेरी आँखों के सामने ओझा और सहदेव ने मेरी कटी हुई जुबान को छोटे-छोटे टुकड़ों में कर, उसमें चावल का दाना मिलाकर मुर्गी से चरवाया, फिर सभी लोग लाश लेकर दफनाने चले गये उनके पीछे-पीछे मेरे पति भी गये।

वहाँ पर उन्होंने लाश को दफनाने के बाद उसकी कब्र पर मुर्गी छोड़कर चले आये। वह मुझे उसी हाल में छोड़कर चले गये। आस पड़ोस की औरते भी मुझे डायन समझकर अकेले तड़पते हुए छोड़कर चली गयी। मैं रात भर बिना दवा के रोती बिलखती रही। सुबह से कुछ खाना भी नहीं था। जुबान कटने के बाद तो मुझसे पानी भी नहीं पीया जा रहा था। रातभर मैं कलपती रही किसी ने मेरी मदद नहीं की। छोटे-छोटे बच्चों को किसके भरोसे मैं छोड़कर अस्पताल जाती। आज भी इन बातों को याद करती हूँ तो उन लोगों पर गुस्सा आता है। सोचती हूँ क्या सचमुच मैं डायनहूँ।

सुबह हुई चारो तरफ बात फैल गयी। मैं म्योरपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर अपनी दवा लेने गयी तो वहाँ के डाक्टर ने मेरे पति से पुछा क्या हुआ वह उन्हें सारी बात बताये। तभी वहाँ पर दुद्धी थाना के दरोगा और सिपाही एक जीप से आये। मुझे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया।

बार-बार दरोगा मुझसे पुछते कि क्या हुआ था। मेरे मुँह से आवाज नहीं निकलता बोलने की कोशिश करती तो मेरा घाव दर्द करता। सभी ने मेरे पति से बयान लिया।

चार दिन तक मेरा इलाज हुआ मेरे बच्चे घर पर अकेले थे। पति मेरी देखभाल करते। बस्ती से कोई भी मुझसे मिलने नहीं आया। मुझे हर वक्त अपने बच्चों की चिंता लगी रहती थी। सोचती कहीं उन लोगों के साथ वह लोग कुछ उल्टा सीधा न  करें।

मैं अस्पताल से घर वापस आयी तो पता चला सहदेव का छोटा लड़का जो बीमार था वह भी मर गया। यह सुनते ही मेरा जी फिर से धक-धक करने लगा। मेरे हाथ पैर काँपने लगे। बार-बार यही सोचकर मन शान्त करती कि सहदेव और ओझा तो पुलिस कि गिरफ्त में है।

लेकिन अभी भी डर लगता है कि जब वह छुटकर आयेंगे तब उनका व्यवहार हमारे प्रति कैसा होगा। मेरे पति बहुत ही सीधे हैं। वह लोग मुझे डायनकहकर मेरी जमीन हड़पना चाहते हैं। बस्ती में पहले भी एक परिवार के लोग झगड़ा करकर बेघर कर चुके हैं।

मेरी जमीन, मेरा घर हड़पकर मुझे बेघर करना चाहते हैं डायनकहकर मेरी जीभ काटकर मुझे यहाँ से भगाना चाहते हैं।

यहीं चिन्ता दिन रात खाये जा रही है। रात को नीद नहीं आती, मन हमेशा घबराता है। मुझे सही ढंग से खाया नहीं जाता, गिलास से सीधे पानी नहीं पी पाती, आवाज भी लड़खड़ाती है जब बोलती हूँ तो जुबान लड़ती है।

मैं चाहती हूँ जिन लोगों ने मेरे साथ ऐसा किया है मुझें डायनबनाया है उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले। अभी भी सहदेव के डर से बस्ती के लोग मेरे पास नहीं आते। बाहर का कोई भी मिलने आता है तो वह लोग कहते हैं लिखने से क्या होगा। मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह बात सुनते ही मुझे बहुत जोर से गुस्सा आता है।

आपको सारी बात बताकर मेरा मन हल्का हुआ है, आपने जब मेरी बात को पढ़कर सुनाया तो मेरा विश्वास बढ़ा है मेरे अन्दर का डर कुछ खत्म हुआ है।

संघर्षरत पीडि़ता-जागेसरी देवी

साक्षात्कारकर्ता-फरहत शबा खानम्

डायन प्रथा से उत्‍पीडिता का सम्‍मान